ढ़ूंढ़ी रक्सिन
ढ़ूंढ़ी रक्सिन
कोलिहा अउ बेंदरा दूनों मितान बदिन। जउन काम करैं दूनों सोंच-सोंच के जउन फ़ल गवैं दूनों बांट-बांट खांवैं। ढूंढ़ी रक्सिन एक दिन नदिया नहाय गिस तौ कोलिहा सो बेंदरा ह कहिस-" जा मितान! ओखर घर मा घुसर के सुघ्घर-सुघ्घर बने जिनिस ला खाबे, तेखर पाछू मंय जाहूं।" कोलिहा ढूंढ़ी रक्सिन के घर हबर के खावत-मेछरावत रहिस के थोरके बेर पाछू ढूंढ़ी रक्सिन आइस्। ओही डहार ले लगे संकरी ल देख के कहिस -" मोर मंडुरिया म कोन रे?" कुछु आवाज़ नई पाये के पाछू ढूंढ़ी रक्सिन तरिया पार जाके बइठे रोय लागिस के हाथी आइस। हाथी ल जब सब बात के गम मिलिस तौ ओहर ढूंढ़ी रक्सिन संग ओखर घर आइस। हाथी के गरजे ले कोलिहा भीतरी म बैठे-बैठे कहिस-
हाथी के दू दांत टोरौं।
जीयत बाघ ल थपरा मारौं।
बिच्छी के अरई बनाऔं।
सांप के तुतारी बनाऔं।
ढूंढ़ी रक्सिन ल खोज खावौं॥
एला सुन के हाथी हा भगा गे अउ ढूंढ़ी रक्सिन फ़ेर तरिया के पार जाके बैठे रहिस के बघवा आइस। बघवा ल सब बात के गम मिलिस तौ ओहर ढूंढ़ी रक्सिन संग ओखर घर आइस। बघवा के गरजन ल सुन के आघु तो कोलिहा हा हड़बड़ागे, कलबलागे फ़ेर हिरदे ल ठांठ के कहिस-
हाथी के दू दांत टोरौं।
जीयत बाघ ल थपरा मारौं।
बिच्छी के अरई बनाऔं।
सांप के तुतारी बनाऔं।
ढूंढ़ी रक्सिन ल खोज खावौं॥
बघवा पल्ला भागिस अउ ढूंढ़ी रक्सिन फ़ेर पहुंच गे रोवत रोवत तरिया के पार मा, ओ हा उहां बैठे रहिस के बिच्छी आइस। सबो बात के गम मिलिस तौ अब बिच्छी हा ढूंढ़ी रक्सिन के संग ओखर घर आइस। बिच्छी के पारे गोहार ला सुनके भीतरीच ले ओला गोहार पार के कोलिहा ह कहिस-
हाथी के दू दांत टोरौं।
जीयत बाघ ल थपरा मारौं।
बिच्छी के अरई बनाऔं।
सांप के तुतारी बनाऔं।
ढूंढ़ी रक्सिन ल खोज खावौं॥
फ़ेर काय रहिस, बिच्छी हा पटाटोर भागिस अउ ढूंढ़ी रक्सिन फ़ेर पहुंच गे रोवत रोवत तरिया के पार मा। ए बेरा उहां पहुंचिस सांप हा। सब बात ला जान के ओ हा ढूंढ़ी रक्सिन संग ओखर घर गिस। तु भैया , सांप के फ़ुंफ़कारी ला सुन के कोलिहा मने-मन तो डर्रा गे फ़ेर कैसनो कर के भीतरीच ले बोलिस-
हाथी के दू दांत टोरौं।
जीयत बाघ ल थपरा मारौं।
बिच्छी के अरई बनाऔं।
सांप के तुतारी बनाऔं।
ढूंढ़ी रक्सिन ल खोज खावौं॥
अतेक सुनिस और सांप हा सरलउहन भागिस अउ रोव